Tuesday, 18 July 2017

दलित नेत्री की हूटिंग और दलित उद्धार का दावा: मायावती का इस्तीफ़ा


राज्यसभा में चुनौतीपूर्ण तरीके से बहुजन समाजवादी पार्टी की नेत्री मायावती का इस्तीफा अब राजनीति में कई नये मायने पैदा करेगा. एक और जहां राजनीति में हर स्तर पर दलित उद्धार की बात की जाती है, एक दलित को राष्ट्रपति के पद तक पहुंचाने के नाम पर कई कसीदे कसे जाते हैं. राज्यसभा में मायावती को सहारनपुर कर मुद्दें पर बोलने ना देकर शायद संसदीय व्यवस्था पर कई अनुत्तरित सवाल खड़े किये गये हैं. दलित के नाम पर जिस तरीके से सारे दल अपनी रोटियाँ सेक रहें हैं वही दूसरी पार्टी के नेताओं को दलित विमर्श करते देख उनका रवैया कैसे बदल जाता है? ये राज्यसभा में साफ़ दिखा. भाजपा जहां दलित के नाम पर हर मुद्दे को मोड़ रही हैं वहीं एक दलित नेता को दलितों के मुद्दे पर बोलने तक नहीं दिया जाता है. मायावती का भारतीय राजनीति में एक खास स्थान है कम से कम उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति उनके इर्द गिर्द जरूर घूमती है, भले ही अभी उनकी सत्ता में भागीदारी ना के बराबर हो लेकिन उनके कद के सामने कोई और दलित नेता अभी नहीं दिखता है. आपको लालू यादव का हस्र जरूर याद होगा, जब ये कहा जा रहा था कि उनकी राजनैतिक पारी समाप्त हो गयी है लेकिन पिछले विधानसभा चुनावों में सबसे बड़े दल के रूप में उनका लौट आना कई बड़ी बातों की ओर संकेत करता है. मायावती का ये कदम एक बड़े राजनैतिक मंच को तैयार करेगा, दलित के नाम पर खड़े नये दलों के लिए अब अपने अस्तित्व का संकट तय है. 


दलित राजनीति के आज कई आयाम हैं, अब दलित एक वोट बैंक नहीं है, उसे अब उलझाया नहीं जा सकता है. लालू यादव ने मायावती को राजद के कोटे से राज्यसभा में भेजने का आश्वासन कई नये समीकरण तैयार कर रहा है. अब दलितों को खुद अपनी लड़ाई में आगे आना चाहिए. अगर मायावती का इस्तीफा मंजूर नहीं होता है तो इसको सरकार के मुंह पर तमाचा ही माना जाएगा. 


भाजपा ने यहाँ मौक़ा दिया है विपक्ष की अब एकजुट हों और एक बड़ा मुद्दा दलित और अल्पसंख्यकों को लेकर आगे आयें, अब देखना है नीतीश, लालू, मुलायम, अखिलेश, ममता बनर्जी और वामदल इससे क्या सीखते हैं. दूसरी ओर क्या मायावती खुद को अब साबित करने के लिए क्या करती हैं, ये उनके लिए अपने राजनितिक अस्तित्व को बचाने की सबसे बड़ी लड़ाई है.

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