Friday, 7 July 2017

उत्तराखंड में शराब घर तक रोजगार कब्र तक

क्या बात है? उत्तराखंड जिसे लोग देवभूमि कहते हैं वहां शराब तो सरकार द्वारा होम डिलीवर की जा रही है लेकिन जवानी घुट-घुट मर रही है. पिछली सरकार ने जिन युवाओं को रोजगार दिया था अब जांच के नाम पर उनको भी सडकों पर ला दिया गया ही, अशासकीय विद्यालयों में जो भी नियुक्तियां हुयी थी या होनी थी सब पर रोक लगा दी गयी है. पूर्व नियुक्तियां रद्द कर दी गयी हैं, जबकि हाल ये है कि इन विद्यालयों में तमाम पद खाली हैं, अब बात मेरिट के आधार पर नियुक्तियों की हो रही है, इसमें सीबीएसई बोर्ड से पढ़े विद्यार्थियों को फायदा होना तय है, मतलब ठेठ उत्तराखंडी जिसने उत्तराखंड बोर्ड से परीक्षाएं पास की हैं को घाटा होना है. क्या आप जवानों को सडकों पर ला सबका विकास कर पायेंगें?
यही हाल यूपी का है, पुरानी नियुक्तियां रद्द की जा रही हैं और नये नोटिफिकेशन जारी करने की हिम्मत जुटाना योगी और त्रिवेंद्र दोनों के लिए कठिन लग रहा है. देश के कुछ भागों में किसान आत्महत्या कर रहें हैं लेकिन अब भाजपा शासित इन दो राज्यों में युवा भी फांसी लगाने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए.

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सबका साथ सबका विकास अच्छा वाक्य है, सुनने में अच्छा भी लगता है, लेकिन यहाँ तो सिर्फ विनाश है. स्लोगन कुछ यूं हो गया है, "सबको शराब, बिना रोजगार". २०१९ क्या जनता फिर वही गलती करेगी? कुछ बड़ा मुंह फाड़ने वालों के बहकावे में आयेगी? आप विदेशों में जितनी गाथा गानी है गा लो लेकिन हकीकत में ये भी देखो कि देश के एक बड़े युवा वर्ग को किस दोराहे पर ला खड़ा किया है यहाँ सिर्फ दो रास्ते हैं एक नशे का और दूसरा मौत का.

आप अपनी राजनीतिक दुश्मनी निभाते रहें ये भी राजनीति का एक पहलू है, लेकिन जनता को यूं ना मारो. किसान सड़कों पर, जवान सड़कों पर तो विकास कैसे होगा? सड़कों के गढ्ढे भले ही भर लो लेकिन पेट की भी सोचो.
कई युवाओं से जो उत्तराखंड और यूपी में आन्दोलनरत हैं सब ये कह रहें हैं हम थक गये हैं, कई तो अब आस छोड़ बैठे हैं अब जब रोजगार नहीं तो क्या? क्या अपराधी बनेंगे, नशा करेंगें या खुद मरेंगें इस सवाल का जवाब सरकार ही दे पाएंगी. 

(आशुतोष पाण्डेय)


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