Thursday, 21 November 2019

जेएनयू बीएचयू के बहाने राष्ट्रवाद



इस समय देश के अन्दर अघोषित वैचारिक विद्रोह चल रहा है इस विद्रोह के क्या मायने हैं या इसकी उपादेयता क्या होगी, कोई नहीं जानता है. धर्म जाति के आधार पर तो देश में कई बार विरोध दिखें हैं लेकिन वो कभी देश के संवैधानिक ढांचें पर हावी नहीं हुए. वैसे बाहरी तौर पर देखा जाय तो आजादी के बाद से राष्ट्रवाद का सबसे ज्यादा हल्ला इन 5 सालों में हुआ है इससे देश का कितना फायदा हुआ कहा नहीं जा सकता है. लेकिन राष्ट्रवाद की आड़ में घृणा जरूर व्यापक रूप में पनपी है.
Courtesy: Google Search
एक मुस्लिम के संस्कृत पढाने को लेकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों का प्रदर्शन क्या है? विश्वगुरू की कल्पना में जीने वाला देश आज धार्मिक कट्टरता के साथ जी रहा है. प्रो० फिरोज खान संस्कृत के श्लोक नहीं पढ़ा सकते हैं क्या ये ही हिन्दू धर्म का सत्व है. अगर आप कह दो ये गलत तो आप से कहा जाता है दूसरे धर्म की बुराई या कट्टरता को देखो... क्या भारतीय त्तात्विक और वैदिक दर्शन इसकी पुष्टि करता है?

अब यहाँ सवाल ये है कि क्या मैं दूसरे धर्म का उपासक हूँ... नहीं ना, तो दूसरा जो करे करता रहे, मेरा धर्म सर्वोच्च है और रहेगा. ये बात हर धर्म के मानने वाले को समझनी होगी. कट्टरता के साथ जीने वाले देश आपके पड़ोस में हैं उनका हाल देख लो. लेकिन कोई समझने को तैयार नहीं है. जो समझे उसे देशद्रोही कह दो, कितना आसान है.


छात्र आन्दोलन वो भी देश के सबसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का दमन सिर्फ इसलिए किया जा रहा है कि वहां पढने वाला युवा आज सरकार से सवाल पूछ रहा है वह हिम्मत करता है अपने हक मांगने का, नहीं तो फीस वृद्धि को लेकर देश में कई जगह युवा आन्दोलनरत हैं, उनकी आलोचना नहीं होती है. जयप्रकाश नारायण का नवनिर्माण आन्दोलन ऐसे ही युवा छात्रों का आन्दोलन था तब किसी ने उन छात्रों को अराजक या देशद्रोही नहीं कहा वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी भी उससे जुड़े रहे. आन्दोलनों पर लाठी चलती है, लेकिन आन्दोलनकारियों को कभी देशद्रोही करार नहीं दिया गया. ये कैसी सत्ता है जो मूकदर्शक हो ये सब की साक्षी है. क्यों शासक इतने भयभीत हैं कि छात्रों के एक आन्दोलन से उनको सत्ता छिनती दिख रही है.


यहाँ बड़ी बात ये है कि देश का अवाम चुप है जैसे उसे कुछ फर्क ही ना पड़ता हो, सवाल करने वालों को ट्रोल कर, उनको गाली दे, उनकी हत्या कर उसको अपना राष्ट्रीय कर्तव्य पूरा हुआ दिखता है. शायद आज आप इन बातों को ना पचा पायें लेकिन आने वाले एक या दो दशक में ही आप खुद को धिक्कारेंगे कि उस समय इन गलत बातों के साथ आप क्यों खड़े थे? आज जो लाठी किसी और कि संतानों पर पड़ रही है कल किसी सवाल के जवाब में आपके बच्चे को भी पड़ेगी. जान लीजिये उस वक्त तक ये लाठी और मजबूत होगी.

आज  पुलिस जिस तरीके से एक दिव्यांग को जूतों से रौंद रही है और आप तालियाँ बजा रहें हैं कल जब इस स्थान पर आपका बच्चा होगा तो क्या करेंगे? सत्ता का मद इतना बुरा होता है कि हर सिर चाहे बाप का ही क्यों ना हो काट दिया जाता है. इतिहास पढ़ लीजिये जनाब, अगला सिर आपका हो तो कोई आश्चर्य मत कीजियेगा.

(आशुतोष पाण्डेय)
नेशनल न्यूजकॉज 

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