Saturday, 21 December 2019

सरकार की जिद्द और विपक्ष का गुमराह: देश जलने लगा


सरकार ने एक कानून क्या पास किया, पूरा देश जलने लगा ऐसा क्यों हुआ. क्या सरकार फेल हो गई? या फिर कहानी कुछ और है. देश में जब बेरोजगारी बढ़ रही है, छात्र जब फीस बढ़ने के कारण सड़कों पर थे , बैंक डूब रहे थे महंगाई बढ़ रही थी, नौकरियाँ जा रही थी असन्तोष बढ़ने वाला था सरकार से सवाल पूछे जाने वाले थे.

ऐसे में सरकार को कुछ तो करना था, धारा 370 कश्मीर से हटाई लेकिन उसके बाद हुए राज्य विधानसभा चुनावों  में भाजपा को आशातीत सफलता ना मिलना अब भाजपा के लिए ये अस्तित्व का सवाल बन गया था ऐसे में कुछ ऐसा करना लाजमी था जिससे आम जन का ध्यान मुख्य और मूल मुद्दों से भटके. कोशिश खूब हुई लेकिन तब तक जनता भाजपा के दोहरे चरित्र को समझ चुकी थी. उसको लगने लगा था यहां सिर्फ बातें होती हैं, वास्तविकता खोखली है. अब बात करते हैं नागरिकता संशोधन कानून की इस बिल के पास होते ही पूरे देश में जनता सड़कों पर उतर आयी.
इस कानून से क्या हो गया कि पूरे देश में पुलिस पर पत्थर बरसने लगे, आग लगने लगी ट्रैन रोक दी गयी. वैसे देश में नागरिकता को लेकर कानून पहले से ही है, लेकिन यहां इसी कानून में संशोधन कर कुछ नयी बातें जोड़ दी गई, सबसे खास पहलू ये है कि पाकिस्तान बंग्लादेश और अफगानिस्तान में रह रहे हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी धर्म के लोग धार्मिक उत्पीडन के आधार पर देश की नागरिकता प्राप्त कर सकते हैं लेकिन मुसलमानों को इस सूची में शामिल नहीं किया गया है. इस बात को लेकर मुस्लिम समुदाय के लोगों में जबर्दस्त गुस्सा पैदा हुआ और उसकी परिणति ये हुई की दिल्ली के जामिया विश्वविद्यालय से शुरू प्रदर्शन पूरे देश में फैल गया और हिंसक हो गया जिसमें करोड़ों की सम्पति का नुकसान हुआ और साथ ही कई मौतें भी हो गई. जबकि ये तीनो देश मुस्लिम बहुल देश में जहाँ मुस्लिमों का धार्मिक उत्पीड़न होना संभव नहीं है. ऐसे में सरकार का कदम ठीक है. वैसे भी इन तीन देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति काफी खराब है. 

अब आकलन इस बात का कि ये सब क्यों हुआ? दरअसल देश में निष्क्रिय हो चुका विपक्ष अपना अस्तित्व गवां चुका था तो इस कानून के रूप में इन विपक्षी दलों को संजीवनी मिल गयी और उन्होंने मुस्लिम और गरीब वर्ग को डराना शुरू कर दिया गया कि भाजपा उनको खत्म करने की साजिश कर रही है. जिस जनता ने घोषणा पत्र में एन सी आर, समान नागरिक संहिता की बात बार बार कहने वाली उसी भाजपा को गत छः सालों में जनता ने पूरे देश में व्यापक बहुमत दिया था. अब जनता उससे क्यों उखड़ गई?

ये असन्तोष कई रूपों में जनता के बीच पनप रहा था, बस यहां उसे हवा मिल गयी, विपक्ष ने इसका खूब फायदा उठाया और सरकार और भाजपा नेताओं के बड़े बोलों ने भी आग में घी का काम किया. इस बिल को संसद में पेश करते हुए अमित शाह की जो भावभंगिमा थी उससे जिद की बू आ रही थी इसी कारण मोदी सरकार को यहां इस व्यापक विरोध का सामना करना पड़ा है. भाजपा के पास ऐसे नेताओं की कमी नहीं जो कहीं भी किसी को भी भड़का सकते हैं. जो गोडसे को देशभक्त बता चुनाव जीत सकते हैं वो घृणा के बल पर कुछ भी कर सकते हैं.

देश को भटकाने में भाजपा और विपक्ष दोनों सफल हुयी हैं और देश इतनी ही आसानी से भटक भी गया लेकिन अब देश के लोगों को समझना होगा कि इन आभासी मुद्दों को छोड़ मूल मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना होगा. नहीं तो देश एक बड़े विघटन की ओर बढ़ेगा अभी एन सी आर और एन पी आर पर भी काफी कुछ होगा. ना ही सरकार और ना ही विपक्ष इस समय जनता को इस व्यूह से बाहर खींचना चाहता है.
(आशुतोष पाण्डेय)

Sunday, 15 December 2019

नागरिकता संशोधन बिल: आग ही आग



नागरिकता संशोधन बिल को मोदी सरकार ने आसानी से संसद के दोनों सदनों में पास करवा लिया है. लेकिन उसके बाद के हालात उनके काबू से बाहर होते जा रहे हैं. आसाम फिर पo बंगाल और अब दिल्ली #CAB यानि सिटीजन अमेंडमेंट बिल के बाद धुँआ धुआँ हो रही है. बिल में क्या ठीक है या क्या गलत ये बात खास नहीं है आम आदमी का डर कुछ और है, उसे धारा 370 हटाने के बाद का अभी तक कई बैन के बीच कश्मीरियों का जीवन दिख रहा है.
कश्मीर में तो सरकार सेना के सहारे विद्रोह का दमन करने में सफल रही है लेकिन CAB पर सरकार ज्यादा ही विश्वास दिखा उसे लगा कि कश्मीर के बाद कोई विरोध नहीं होगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ, पूर्वोत्तर के साथ दिल्ली भी जलने लगी है. आज देखें तो देश में सरकार के खिलाफ कई समूह खड़े है उसमें छात्र भी है, असन्तोष से भरे युवा हैं, कर्मचारी हैं, पुलिस भी संतुष्ट नहीं है.
जामिया विद्रोह: दिल्ली फोटो: गूगल
आज जामिया के छात्रों का आंदोलन शाम होने तक आगजनी और पत्थरबाजी तक पहुंच गया ये हाल राजधानी दिल्ली का है. शाम होते ही दिल्ली पुलिस जामिया के अंदर घुसी है और छात्रों और छात्राओं पर लाठीचार्ज किया है इसमें कई छात्र घायल भी हुए हैं. इसके बाद दिल्ली विश्विद्यालय के छात्र भी जामिया स्टूडेंट्स के सपोर्ट में ITO पर इकठ्ठे हो गए हैं, इस आलेख को लिखे जाने तक जामिया और दिल्ली विश्विद्यालय के छात्रों के पुलिस मुख्यालय से हटाए जाने की कोई जानकारी पुलिस ने नहीं दी है. लेकिन जल्द ही सरकार इस मसले पर कोई बड़ा कदम न उठा सकी तो शायद हालात हाथ से निकल जाएं. स्टूडेंट के विद्रोह को डंडे के सहारे ज्यादा देर तक रोका नहीं जा सकता है कहीं ज्यादा देर देश को अनिश्चित संघर्ष की राह में धकेल ना दे. सरकार को दमन नहीं बातचीत का रास्ता अख्तियार करना चाहिए. वैसे जल्द ही दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं.
(आशुतोष पाण्डेय)